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अध्याय १: प्रलय की आहट (भाग - १) ​वर्ष ३०५० की वह धुंधली भोर, महानगर 'आर्यावर्त-२' की विशालकाय और अभेद्य दीवारों पर किसी ठंडी राख की तरह लिपटी हुई थी। यहाँ सूरज की किरणें बादलों से छनकर नहीं, बल्कि कृत्रिम ओजोन-फिल्टरों से रगड़ खाकर आती थीं, जिससे पूरा शहर एक बीमार पीली रोशनी में नहाया हुआ प्रतीत होता था। पृथ्वी अब वह रत्नगर्भा धरा नहीं रही थी; अब वह केवल कंक्रीट, सिलिकॉन और अंतहीन डेटा-केबल्स का एक यांत्रिक पिंड मात्र थी। यहाँ की हवा में ऑक्सीजन कम और नैनो-चिप्स की धूल अधिक थी।

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