दिसंबर की कड़ाके की ठंडी रात थी। आसमान में घने बादल छाए थे और चांद भी कहीं छिप गया था। गांव के बाहर बना पुराना रेलवे स्टेशन कई सालों से वीरान पड़ा था। टूटी दीवारें, जंग लगी पटरियां और हवा की सीटी जैसी आवाज़... सब कुछ ऐसा लगता था जैसे वहां अभी भी कोई रहता हो।
गांव के लोग कहते थे—आधी रात को वहां एक ट्रेन रुकती है... लेकिन उसमें जो बैठता है, वो कभी वापस नहीं आता।
गांव के दो दोस्त—विक्रम और जीतू—इन बातों पर यकीन नहीं करते थे।