4 मार्च, 1193... सलाहुद्दीन बीमार पड़ गए थे। लेकिन यह बीमारी शरीर की नहीं थी... यह थी उनके दिल की बीमारी। क्यों? क्योंकि उन्होंने इतने लोगों को मारा था... चाहे वे दुश्मन ही क्यों न हों। उन्होंने अपने साथियों से कहा... 'मुझे माफ करना... मैंने जितनी जंगें जीती हैं, उतनी ही मैंने दुआ में माफ़ी मांगी है।' यही था उनका असली राज़... उनका दिल हमेशा रोता था, चाहे वे मुस्कुराते क्यों न दिखते हों।