दिल्ली शहर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में, ऊँची-ऊँची इमारतों और ट्रैफिक के शोर के बीच, एक छोटी-सी दुनिया बसती थी—एक माँ और उसकी बेटी नव्या की।
नव्या 7वीं कक्षा में पढ़ती थी। वह बहुत ही होशियार, लेकिन थोड़ी सी शर्मीली लड़की थी। उसकी माँ, पूनम, एक ऑफिस में काम करती थीं। सुबह जल्दी उठकर वह घर का सारा काम करतीं, नव्या को स्कूल के लिए तैयार करतीं और फिर खुद ऑफिस के लिए निकल जातीं।
हर दिन की तरह उस दिन भी सुबह जल्दी-जल्दी सब कुछ हो रहा था।
“नव्या, जल्दी करो बेटा, बस छूट जाएगी!” माँ ने आवाज लगाई।