ईंटों के भट्ठे की आग उस दिन भी वैसे ही धधक रही थी जैसे हर रोज धधकती थी, लेकिन उस आग के बीच एक कहानी धीरे-धीरे आकार ले रही थी जिसे कोई देख नहीं पा रहा था। सुबह का वक्त था, आसमान अभी पूरी तरह उजाला नहीं हुआ था और धुंध में लिपटी हवा में कोयले और गीली मिट्टी की मिलीजुली गंध फैली हुई थी। उसी धुंध के बीच एक औरत अपने सिर पर कच्ची ईंटों का बोझ उठाए धीरे-धीरे चल रही थी। उसका नाम कमला था। उम्र मुश्किल से बत्तीस साल, लेकिन चेहरे पर उम्र का बोझ पचास साल जैसा दिखाई देता था। उसके पैरों में टूटी-फूटी चप्पलें थ