इस बार आवाज़ बिस्तर के नीचे से आई।
राहुल धीरे-धीरे पीछे हटा।
कमरा अब छोटा लगने लगा था… जैसे दीवारें पास आ रही हों।
टक… टक…
अब साफ़—बिस्तर के नीचे।
उसने नीचे झाँकने की हिम्मत नहीं की।
क्योंकि उसे पता था—अगर उसने देख लिया… तो कुछ बदल जाएगा।
कुछ ऐसा, जिसे वह वापस नहीं कर पाएगा।
लेकिन आवाज़ बंद नहीं हुई।
टक… टक… टक…
अब वो आवाज़… जैसे जवाब चाह रही हो।
राहुल ने काँपते हुए कहा, “कौन है?”
एक पल की खामोशी।
फिर… बहुत धीरे, बहुत पास से—
“तू…”
राहुल का गला सूख गया।
आवाज़… उसकी अपनी थी।
वह