# मिट्टी की छाया
फारसू पैर घसीटते हुए दहलीज़ पर बैठ गया। खुरदरी उंगलियाँ चिकने पत्थर पर फेरीं, घुटनों पर हाथ रखकर आसमान देखता रहा।
"अंदर आ जाओ," बहू की आवाज़ आई। फारसू धीरे उठा, हड्डियाँ चरचराईं। गद्देदार कुर्सी पर बैठना उसे कभी नहीं भाया — आदत थी पुराने घर की चौड़ी दहलीज़ की।
दरवाज़े पर पुरानी इमली थी। उसकी ठंडी छाँव माँ के आँचल जैसी थी। हवा खपरैल से ऐसे गुज़रती जैसे कोई धीरे फूँक मार रहा हो। फारसू वहीं बैठता — पत्ते झरते देखता, गिलहरियाँ चढ़ते देखता। रात को वह और अबू इमली की जड़ों पर बैठकर
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