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अक्टूबर 1962 से ठीक पहले हिमालय की ठंडी और खामोश वादियों में कुछ ऐसा हो रहा था जिसे कुछ भारतीय सैनिक साफ-साफ देख रहे थे, लेकिन हजारों किलोमीटर दूर दिल्ली में उसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। पूर्वोत्तर सीमा का इलाका, जिसे उस समय नेफा यानी नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी कहा जाता था, घने जंगलों, ऊँचे पहाड़ों और बेहद कठिन रास्तों से भरा हुआ था। यहाँ तक पहुँचना ही एक चुनौती था। फिर भी यहीं भारतीय सेना की छोटी-छोटी इंटेलिजेंस पेट्रोल पार्टियाँ नियमित रूप से गश्त करती थीं।

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