लेकिन जैसे ही वह आखिरी मूरत की ओर बढ़ा, कैमरा उसके हाथ से जलकर खाक हो गया। वह मूरत किसी और की नहीं, बल्कि खुद राघव की थी।
"अधूरा सच सबसे बड़ा झूठ होता है, राघव," पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई। राघव पलटा, तो वहाँ कोई नहीं था, बस एक बड़ा सा आइना था। आइने में राघव का अक्स नहीं था, बल्कि वहाँ ठाकुर विक्रम सिंह खड़ा मुस्कुरा रहा था।
"तुमने सोचा कि तुम नायक हो? तुमने सोचा कि तुमने सबको आज़ाद कर दिया?" ठाकुर का अक्स आइने से बाहर निकलने लगा। "इस हवेली का राज यह नहीं है कि यहाँ रूहें कैद हैं। राज यह है