उसके पास सिर्फ कुछ सेकंड थे। उसने दीये की नीली लौ की ओर देखा और फिर उस धड़कते हुए पुतले की ओर। उसे एक बड़ा फैसला लेना था, जिससे रतनपुर का भविष्य हमेशा के लिए बदल जाने वाला था।राघव के हाथ कांप रहे थे। तहखाने की छत से चूना झड़ रहा था और ऊपर से आती सैकड़ों कदमों की आहट अब बिल्कुल सिर पर महसूस हो रही थी। 'हूँ-हूँ' की एक डरावनी आवाज़ पूरी हवेली में गूँज रही थी, जैसे पूरा गाँव एक साथ विलाप कर रहा हो।
पुतला राघव के हाथ में वैसे ही धड़क रहा था जैसे कोई जीवित हृदय। ठाकुर का धुंधला साया अब एक विशाल काली छ