अब बात करते हैं उस कड़वे सच की, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। हम और आप—यानी इस देश की 'आम जनता'।राशन की दुकान के बाहर लगी वो लंबी कतारें सिर्फ अनाज के लिए नहीं हैं... वो गवाह हैं हमारे गिरते हुए आत्म-सम्मान की। हमने सरकार से अस्पताल मांगे थे, हमने स्कूल मांगे थे, हमने अपने युवाओं के लिए नौकरियां मांगी थीं... लेकिन बदले में हमें थमा दिया गया 5 किलो का एक झोला। और त्रासदी ये है, कि हम उसी में खुश हो गए।"