अरुण बचपन से ही समझदार था।
वह जानता था कि उसके पिता कितनी मेहनत करते हैं।
स्कूल से लौटने के बाद वह पहले घर के छोटे-मोटे काम करता, फिर पढ़ाई करने बैठ जाता।
लेकिन पढ़ाई करना आसान नहीं था।
घर में बिजली नहीं थी।
रात को एक छोटा सा दीया जलाया जाता था।
अरुण उसी दीये की रोशनी में पढ़ता था।
कभी-कभी हवा चलती और दीया बुझ जाता।
लेकिन वह फिर से उसे जलाता और पढ़ाई शुरू कर देता।
गाँव के कई लोग उसे देखकर हँसते थे।
“अरे… मजदूर का बेटा है, इतना पढ़कर क्या करेगा?”
“आखिर में मजदूरी ही करेगा।”
लेकिन अरुण चुप रहता।