गाँव 'रतनपुर' देखने में तो किसी भी आम भारतीय गाँव जैसा था—हरे-भरे खेत, चहचहाते पक्षी और शाम को चौपाल पर जमने वाली महफ़िलें। लेकिन इस गाँव की एक रीत थी जिसे बरसों से निभाया जा रहा था। सूरज ढलते ही गाँव के दक्षिण की ओर बनी उस पुरानी हवेली की तरफ कोई मुड़कर भी नहीं देखता था।
शहर से आए राघव। ,के लिए ये सब महज़ अंधविश्वास था। राघव एक पत्रकार था और उसे पुरानी इमारतों के पीछे छिपे इतिहास को कुरेदने का शौक था। जब वह पहली बार रतनपुर पहुँचा, तो उसे गाँव के बुज़ुर्ग काका 'बिहारी' ने पहली ही शाम चेतावनी दी