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ଭାଗିଦାରୀ ଧ୍ୱନି

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अगली सुबह राजमहल का वातावरण पहले जैसा नहीं था; नगाड़े बज रहे थे, दरबार सजा था, सुनहरे स्तंभों पर रोशनी पड़ रही थी, पर हवा में घमंड की जगह एक अनकहा तनाव तैर रहा था। पूरी रात राजा वीरेंद्र सो नहीं पाए थे। आरव के शब्द उनके भीतर बार-बार गूंज रहे थे—सबसे बड़ा मूर्ख वह है जो स्वयं को सर्वज्ञ समझ ले। यह वाक्य उनके मन के उस हिस्से तक पहुँच गया था जहाँ वे वर्षों से झाँकने से बचते रहे थे। दरबार लगा, सैनिक अनुशासन में खड़े हुए, मंत्री अपनी-अपनी जगह पर बैठे, और घोषणा हुई कि किसान पुत्र आरव को प्रस्तुत किया

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