रात बहुत गहरी हो चुकी थी।
गाँव की गलियों में सन्नाटा पसरा था।
कहीं दूर से कुत्तों के भौंकने और झींगुरों की आवाज़ें आ रही थीं।
गाँव के आख़िरी मोड़ पर एक पुरानी पान-बीड़ी की दुकान थी।
पीली बल्ब की कमज़ोर रोशनी में दुकान आधी अंधेरे में डूबी हुई थी।
दुकान के सामने रखी लोहे की कुर्सियों पर दो आदमी बैठे थे