रात के 11 बज चुके थे। कोंकण के घने जंगलों के बीच से गुजरने वाला वह पुराना हाईवे पूरी तरह से सुनसान था। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। ऐसा लग रहा था मानो आसमान आज फट ही पड़ेगा। मैं, यानी कबीर, अपनी पुरानी जीप को उस कीचड़ भरे रास्ते पर धकेलने की कोशिश कर रहा था। मैं एक ट्रैवल ब्लॉगर हूँ, और मुझे ऐसी ही वीरान, भूतिया जगहों की तलाश रहती थी। मेरे साथ मेरा ड्राइवर और गाइड, रघु था। रघु पिछले एक घंटे से मुझे वापस मुड़ने की सलाह दे रहा था। "साहब, आगे जाना ठीक नहीं है। यहाँ के लोग कहते हैं कि 'गुड़िया