राघव की बस गाँव की धूल उड़ाती हुई पक्की सड़क पर चढ़ चुकी थी। खिड़की से आती ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी, लेकिन उसका मन अब भी उसी पीपल के पेड़ के पास अटका था। उसने अपनी जैकेट की जेब में हाथ डाला और वो कोरी डायरी बाहर निकाली। पन्ने अब भी सफेद थे, लेकिन जैसे ही सूरज की पहली किरण उन पन्नों पर पड़ी, राघव की आँखें फटी की फटी रह गईं।
डायरी के आखिरी पन्ने पर, जहाँ पहले मंत्र लिखा था, अब एक नई लिखावट उभर रही थी। यह स्याही से नहीं, बल्कि उभरे हुए अक्षरों में था, जैसे कागज़ के अंदर से कोई चीज़ बाहर झाँ