गांव के किनारे एक पुराना पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे बैठकर अर्जुन हर शाम डाकिए का इंतज़ार करता था। उसके हाथ में हमेशा एक पुरानी चिट्ठी रहती—पीली पड़ चुकी, किनारों से फटी हुई, लेकिन उसके लिए किसी खज़ाने से कम नहीं।
यह चिट्ठी उसकी बहन मीरा की थी, जो शहर पढ़ने गई थी। जाते वक्त उसने कहा था,
“भैया, मैं हर हफ्ते त…
गांव के किनारे एक पुराना पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे बैठकर अर्जुन हर शाम डाकिए का इंतज़ार करता था। उसके हाथ में हमेशा एक पुरानी चिट्ठी रहती—पीली पड़ चुकी, किनारों से फटी हुई, लेकिन उसके लिए किसी खज़ाने से कम नहीं।
यह चिट्ठी उसकी बहन मीरा की थी, जो शहर पढ़ने गई थी। जाते वक्त उसने कहा था,
“भैया, मैं हर हफ्ते तुम्हें चिट्ठी लिखूंगी।”
शुरू में सच में चिट्ठियाँ आती रहीं—हर हफ्ते, हर महीने। मीरा अपने कॉलेज, दोस्तों और सपनों के बारे में लिखती। अर्जुन उन चिट्ठियों को बार-बार पढ़ता और मुस्कुराता।
फिर अचा
Faịlụ ụda a gachara oge ya.
Ndesịta njikọ ụda mepere emepe ga-agwụ mgbe awa 24 gachara. I nwere ike ịmepụta nke gị n'okpuru!
Kewapụta ụda AI gị onwe gị
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