राघव के कानों में वो आवाज़ अब भी गूँज रही थी। वो ठंडी हवा का झोंका नहीं था, बल्कि किसी की दबी हुई फुसफुसाहट थी। उसने पीछे मुड़कर देखा, तो धूल भरे कमरे में सिर्फ सन्नाटा पसरा था। लेकिन ज़मीन पर बने वे पदचिह्न, जो सीढ़ियों की तरफ नहीं बल्कि दीवार की ओर जाकर खत्म हो गए थे, राघव के दिमाग में खलबली मचा रहे थे। उसने हिम्मत जुटाई और उस दीवार को थपथपाया जहाँ निशान खत्म हुए थे। दीवार खोखली लग रही थी। जैसे ही उसने थोड़ा ज़ोर लगाया, एक गुप्त दराज बाहर निकल आई। उसमें एक पुरानी, पीली पड़ चुकी डायरी रखी थी।
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