रात के समय एक युवा भिक्षु अपने कक्ष में बैठा था।
दीपक की हल्कीलौ टिमटिमा रही थी।
बाहर हवा बह रही थी, मगर उसके मन में और भी तेज़ तूफ़ान उठ रहा था।
वह लगातार सोच रहा था –
“क्या मैंने सही रास्ता चुना?
क्या मैं ज्ञान प्राप्त कर पाऊँगा?
अगर नहीं तो?
अगर गुरुजी नाराज़ हो गए तो?
अगर मैं असफल हुआ तो?”
उसके मन में एक के बाद एक विचार उठ रहे थे।
जैसे समुद्र की लहरें किनारे पर टकराकर लौट जाती हैं, वैसे ही विचार आते और उसे थका देते।