ग़बन
बरसात के दिन है, सावन का महीना। आकाश में सुनहरी घटाएं छाई हुई है। रह-रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है। अभी तीसरा पहर है; पर मालूम हो रहा है,शाम हो गयी है।आमों के बाग़ में झूला पड़ा हुआ है। लड़कियां झूल रही है और उनकी माताएं भी। दो-चार झूल रही है, दो चार झूला रही हैं। कोई कजली गाने लगती है, कोई बारहमासा।इस ऋतु में महिलाओं की बाल स्मृति भी जाग उठती है।ये फ़ुहारें मानों चिंताओं को हृदय से धो डालती है। मानों मुरझाए हुए मन को भी हरा कर देती है।सबसे दिल उमंगों से भरें हुए है।धानी साड़ियों ने प्रक