फरसू अब बूढ़ा हो चुका था। उसके कदम भारी हो गए थे। वह धीरे-धीरे अपने पुराने घर की सीढ़ी तक आया और वहीं बैठ गया। उसने अपने खुरदरे हाथों से उस चिकनी पत्थर की सीढ़ी को छुआ। जैसे वह पत्थर नहीं, उसकी पुरानी यादें हों।
फिर वह दोनों घुटनों पर हाथ रखकर आसमान की तरफ देखने लगा।
उसका मन फिर से पुराने दिनों में चला गया।
तभी उसकी बहू ने अंदर से आवाज दी,
“उठो, अंदर जाकर बैठो।”
फरसू धीरे-धीरे दरवाजे का सहारा लेकर उठा। उसके पैरों की हड्डियाँ चटकने लगीं। वह अंदर जाकर नरम गद्देदार कुर्सी पर बैठ गया। लेकिन उस कु